“श्री यंत्र” सबसे महत्वपूर्ण एवं शक्तिशाली यंत्र है। “श्री यंत्र” को यंत्र राज कहा जाता है क्योकि यह अत्यन्त शुभ फ़लदयी यंत्र है। जो न केवल दूसरे यन्त्रो से अधिक से अधिक लाभ देने मे समर्थ है एवं संसार के हर व्यक्ति के लिए फायदेमंद साबित होता है। पूर्ण प्राण-प्रतिष्ठित एवं पूर्ण चैतन्य युक्त “श्री यंत्र” जिस व्यक्ति के घर मे होता है उसके लिये “श्री यंत्र” अत्यन्त फ़लदायी सिद्ध होता है उसके दर्शन मात्र से अन-गिनत लाभ एवं सुख की प्राप्ति होति है।

“श्री यंत्र” मे समाई अद्रितिय एवं अद्रश्य शक्ति मनुष्य की समस्त शुभ इच्छाओं को पूरा करने मे समर्थ होति है। जिस्से उसका जीवन से हताशा और निराशा दूर होकर वह मनुष्य असफ़लता से सफ़लता कि और निरन्तर गति करने लगता है एवं उसे जीवन मे समस्त भौतिक सुखो कि प्राप्ति होति है।

“श्री यंत्र” मनुष्य जीवन में उत्पन्न होने वाली समस्या-बाधा एवं नकारात्मक उर्जा को दूर कर सकारत्मक उर्जा का निर्माण करने मे समर्थ है। “श्री यंत्र” की स्थापन से घर या व्यापार के स्थान पर स्थापित करने से वास्तु दोष य वास्तु से सम्बन्धित परेशानि मे न्युनता आति है व सुख-समृद्धि, शांति एवं ऐश्वर्य कि प्रप्ति होती है। 


श्री यन्त्र










A devotee desirous of acquiring wealth and prosperity must worship Goddess Laxmi with appropriate rituals. He should begin by making salutations to the goddess by chanting the following mantra --





Shree Yantra is one of the most auspicious, important and powerful Yantras, which not only gives the maximum benefit, but also proves beneficial for almost everybody. It is the source of attaining all worldly desires & fulfilling all wishes through inner cosmic power & mental strength. "Shree Yantra" - Shree meaning wealth and Yantra - Meaning "Instrument" - The Instrument for Wealth the Shree Yantra brings about material and spiritual wealth.

Shree Yantra has that unexplained power to fulfill all our wishes and change our life for the better. Shree Yantra is definitely the answer to all the problems and negativity in our life . Any Person using Shree Yantra achieves much greater affluence, peace and harmony. Shree Yantra helps in breaking all the Obstacles in our life . It helps us push indefinitely and easily the limits of growth - both spiritually and materialistically. There are negative energies around us in greater or smaller magnitude. These negative energy stands in our way of achieving greater success, affluence, Harmony and Peace. Many times we find that life is out of our control. We find ourselves in a position of Extreme stress , lack of peace and harmony , high degree of anxiety , friction in relationship with others , Bad investments , faltering business , stagnation in life and profession , decreasing financial prospects , insecure feeling , repeated failures and sheer bad luck - Though we involve our best efforts , hard work , intelligence and good intentions .

catches the light and reflects beautiful rainbows. It is a symbol of radiant white light energy. Its power lies in its structure reaching towards light form type depths of the earth. The crystal acts as a catalyst, a conductor of energy. It is a both a receiver and transmitter. Crystal attune themselves automatically to human liberations because of their affinity with human spirits writing spiritual links when they one worn or held. Crystal protect you from outside negative vibrations.

The crystal is itself a forceful field of light and energy, which can be used as sonic protections against negativity. This property exists in all sizes of crystals including the small ones, we wear or carry. The passage of ions through the molecular structure makes them a valuable aid in clearing and neutralizing negative conditions in the aura of people of all ages. It can be used to cleanse the atmosphere of large areas - our homes or places of work, as well. It can become our own personal healer for the body as well as a tranquilizer and transformer for the spirit. It helps our intuitive insight, to see the light in the darkness. When laid on the body, the Crystal Quartz decrystallizes the knots which block the flow of energy.

Shree Yantra Sacred Geometry - help in clearing all the negative energies - the fog that surrounds our life - standing in our way of Peace, Prosperity and Harmony and make everything work for us in orderly manner. Shree Yantra the Multi Pyramid Geometric Grid is in 2 Dimension or 3 Dimension form. In 2 Dimension Form it is a Symbol of 9 Intertwined Isosceles triangle. It has been experienced World wide that Intertwined Triangles. The 6 pointed Star or Double Triangle Jewish sacred Geometry has always been proven to be Good Luck and sacred symbols . The Shree Yantra in the 3 Dimension Meru Type is a multi Pyramid Cosmic Grid signifying unlimited abundance and positive powers. This Multi pyramidal Geometry is with 7 Pyramid steps and 43 petals with Base angle of 51.5032 exact matching of this Geometry brings about optimum results.

Crystal Shree Yantra balances & harmonise the aura around us and remove the negative energy, therefore when we place this crystal shree yantra, in our home or office, the place is purified by the power of crystal and the mystical geometry of shree yantra bless the native with success and wealth. It is evident and proved that those who place this yantra in their home or office replace all negative energies with unlimited abundance and positive power. One should see this yantra daily in the morning and you would see the effect of this yantra from the very first day. ShreeYantra placement or sthaapana in your home/office/vehicle is done on a Friday. Soak in saline water overnight. This takes away all negativity from the crystal. Then take it out, wash in normal water and keep on moist earth (mud) under sunlight for few hours .

Then place the yantra on a plate and wash it with water, and milk mixed with curd, Ghee and saffron. Then wash it again with water. Light incense and sprinkle water where the Yantra is to be kept chanting "Aim Hreem Nemaha" . Place yellow cloth on a platform and place Shree Yantra on it. Put vermillion / Sandal paste on the Yantra. Offer flowers, Gur (jaggery) , raw turmeric and incense to the Yantra .  Beej Mantra of Shree Yantra for one lacs eighteen thousand times.

"Om Shareeng Hareeng Kaleeng Hareeng Shrimahalakshmiaye Namah."

It also depicts one of the fundamental of "Vastu Kala" which says that any residential house, palace or temple must be mounted at the centre to the top, so that the person residing in it should get more and more energy radiation & solar reflections from the cosmic universe or Brahmanda to be more healthy, wealthy and wise. The Crystal Shri Yantra is worshiped similarly as Shri Yantra has another importance. This Yantra is made of crystal which is very powerful and has power to protect you from outside negative energies.




---Adi Sankaracharya 










रहस्यमय और अदभुत श्री यंत्र

भगवती महालक्ष्मी की कृपा प्राप्ति का सबसे प्रभावी उपाय है श्री यंत्र की विधिवत साधनायह एक ऐसा विधान है जो अभूतपूर्व सफलता प्रदायक हैजब किसी भी अन्य उपाय से भगवती की प्रसन्नता प्राप्त न हो पा रही हो तो यह साधना विधान प्रयोग करना चाहिएश्री यंत्र के बारे में कहा गया है कि.

    चतुः षष्टया तंत्रै सकल मति संधाय भुवनम 

स्थितस्तत्सिद्धि प्रसव परतंत्रैः पशुपतिः ।

पुनस्त्वनिर्बन्धादखिल पुरूषार्थैक घटना ।

स्वतंत्रं ते तंत्रं क्षितितलमवातीतरदिदम ।

देवाधिदेव भगवान महादेव शिव ने इस सकल भुवन को ६४ तंत्रो से भर दिया और फिर अपने दिव्य तापसी तेज से समस्त पुरूषार्थों को प्रदान करने में सक्षम श्री तंत्र को इस धरा पर प्रतिष्ठित कियाआशय यह कि श्री विद्या से संबंधित तंत्र ब्रह्‌माण्ड का सर्वश्रेष्ठ तंत्र है जिसकी साधना ऐसे योग्य साधकों और शिष्यों को प्राप्त होती है जो समस्त तंत्र साधनाओं को आत्मसात कर चुके होंइस साधना को प्रदान करने के लिए कहा गया है कि :-

गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतःपिता पुत्रो न दातव्यं गोपनीयं महत्वतः ...

इस विद्या को सप्रयास गोपनीय रखना चाहियेयह इतनी गोपनीय विद्या है कि इसे पिता को पुत्र से भी छुपाकर रखना चाहिये.

तंत्र के क्षेत्र में श्री विद्या को निर्विवाद रूप से सर्वश्रेष्ठ तथा सबसे गोपनीय माना जाता हैश्री विद्या की साधना का सबसे प्रमुख साधन है श्री यंत्र... इसकी विशिष्टता का अनुमान इसी बात से लगाया जाता है कि सनातन धर्म के पुनरूद्धारकभगवान शिव का अवतार माने जाने वालेजगद्गुरू आदि शंकराचार्य ने जिन चार पीठों की स्थापना कीउनमें उन्होने पूरी प्रामाणिकता के साथ श्री यंत्र की स्थापना कीजिसके परिणाम के रूप में आज भी चारों पीठ हर दृष्टि से,फिर वह चाहे साधनात्मक हो या फिर आर्थिकपूर्णता से युक्त हैं.

श्री यंत्र की आकृति

तंत्र में त्रिकोण को अत्यंत महत्व दिया गया हैमुख्य रूप से दो प्रकार के त्रिकोणों का प्रयोग यंत्रों के निर्माण में किया जाता हैपहला अधोमुखी तथा दूसरा उर्ध्वमुखीएक पुरूष रूपी शिव का प्रतीक है तथा दूसरा स्त्री रूपी शक्ति का प्रतीक होता हैइन दोनों त्रिकोणों के विविध संयोजनों से यंत्रों का निर्माण होता है.

शिव प्रतीक शक्ति प्रतीक :

श्री यंत्र भी इन दोनों प्रतीकों का एक विशिष्ट संयोजन हैश्री यंत्र में चार उर्ध्वमुखी शिव प्रतीक त्रिकोण तथा पांच अधोमुखी शक्ति प्रतीक त्रिकोण हैंइस प्रकार यह यंत्र शक्ति बाहुल्यता से युक्त भगवती महाविद्या श्री त्रिपुरसुंदरी का सिद्ध यंत्र है.

इन नौ त्रिकोणों के संयोग से निर्मित इस यंत्र के मय में स्थित त्रिकोण के अंदर इस यंत्र का हृदय भाग होता है जिसमें बिंदु प्रतीक के रूप में महाविद्या श्री त्रिपुरसुंदरी का वास होता हैइन नवत्रिकोणों को शरीर के नवद्वारों का प्रतीक हैइन नवत्रिकोणों को वृत्त के अंदर निर्मित किया जाता हैवृत्त के बाहर पहले अष्ट(आठदल वाला कमल होता है जो अष्ट सिद्धियों का प्रतीक हैपुनः वृत्त जो ब्रह्‌माण्ड का प्रतीक है के बाद षोडश (सोलहदल वाला कमल होता है जो जीवन की संपूर्णता माने जाने वाले षोडश कलाओं का प्रतीक हैंइसके बाहर चार द्वारों से युक्त आवरण होता ह.

भोजपत्र पर श्री यंत्र के निर्माण के लिए अष्टगंध को गंगाजल में घोलकर सोने की कलम से भोजपत्र पर लिखा जाना चाहियेधातु पर यंत्र निर्माण की आधुनिक विधियां श्रेष्ठ हैं जिनमें इचिंग नामक तकनीक के द्वारा रेखाओं को बेहद स्पष्टता के साथ उकेरा जाता हैयदि प्राचीन विधि से धातु पर यंत्र को उकेरा जाए तो यह ध्यान रखना चाहिये कि उभरा हुआ भाग यंत्र का सीधा वाला भाग होअर्थात नालीदार भाग पीछे रहे.

श्री यंत्र से होने वाले लाभ

श्री यंत्र प्रमुख रूप से ऐश्वर्य तथा समृद्धि प्रदान करने वाली महाविद्या त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी का सिद्ध यंत्र हैयह यंत्र सही अर्थों में यंत्रराज हैइस यंत्र को स्थापित करने का तात्पर्य श्री को अपने संपूर्ण ऐश्वर्य के साथ आमंत्रित करना होता हैकहा गया है कि :-

श्री सुंदरी साधन तत्पराणाम्‌ भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव....

अर्थात जो साधक श्री यंत्र के माध्यम से त्रिपुरसुंदरी महालक्ष्मी की साधना के लिए प्रयासरत होता हैउसके एक हाथ में सभी प्रकार के भोग होते हैंतथा दूसरे हाथ में पूर्ण मोक्ष होता हैआशय यह कि श्री यंत्र का साधक समस्त प्रकार के भोगों का उपभोग करता हुआ अंत में मोक्ष को प्राप्त होता हैइस प्रकार यह एकमात्र ऐसी साधना है जो एक साथ भोग तथा मोक्ष दोनों ही प्रदान करती हैइसलिए प्रत्येक साधक इस साधना को प्राप्त करने के लिए सतत प्रयत्नशील रहता है.

इस अद्भुत यंत्र से अनेक लाभ हैंइनमें प्रमुख हैं :-

  • श्री यंत्र के स्थापन मात्र से भगवती लक्ष्मी की कृपा प्राप्त होती है.

  • कार्यस्थल पर इसका नित्य पूजन व्यापार में विकास देता है.

  • घर पर इसका नित्य पूजन करने से संपूर्ण दांपत्य सुख प्राप्त होता है.

  • पूरे विधि विधान से इसका पूजन यदि प्रत्येक दीपावली की रात्रि को संपन्न कर लिया जाय तो उस घर में साल भर किसी प्रकार की कमी नही होती है.

  • श्री यंत्र पर ध्यान लगाने से मानसिक क्षमता में वृद्धि होती हैउच्च यौगिक दशा में यह सहस्रार चक्र के भेदन में सहायक माना गया है.

  • यह विविध वास्तु दोषों के निराकरण के लिए श्रेष्ठतम उपाय है.

विविध पदार्थों से निर्मित श्री यंत्र

श्री यंत्र का निर्माण विविध पदार्थों से किया जा सकता हैइनमें श्रेष्ठता के क्रम में प्रमुख हैं े-





पारद श्रीयंत्र

पारद को शिववीर्य कहा जाता हैपारद से निर्मित यह यंत्र सबसे दुर्लभ तथा प्रभावशाली होता हैयदि सौभाग्य से ऐसा पारद श्री यंत्र प्राप्त हो जाए तो रंक को भी वह राजा बनाने में सक्षम होता है.

स्फटिक श्रीयंत्र

स्फटिक का बना हुआ श्री यंत्र अतिशीघ्र सफलता प्रदान करता हैइस यंत्र की निर्मलता के समान ही साधक का जीवन भी सभी प्रकार की मलिनताओं से परे हो जाता है.

स्वर्ण श्रीयंत्र

स्वर्ण से निर्मित यंत्र संपूर्ण ऐश्वर्य को प्रदान करने में सक्षम माना गया हैइस यंत्र को तिजोरी में रखना चाहिए तथा ऐसी व्यवस्था रखनी चाहिये कि उसे कोई अन्य व्यक्ति स्पर्श न कर सके.

मणि श्रीयंत्र

ये यंत्र कामना के अनुसार बनाये जाते हैं तथा दुर्लभ होते हैं

रजत श्रीयंत्र

ये यंत्र व्यावसायिक प्रतिष्ठानों की उत्तरी दीवाल पर लगाए जाने चाहिये.इनको इस प्रकार से फ्रेम में मढवाकर लगवाना चाहिए जिससे इसको कोई सीधे स्पर्श न कर सके.

ताम्र श्रीयंत्र

ताम्र र्निमित यंत्र का प्रयोग विशेष पूजन अनुष्ठान तथा हवनादि के निमित्त किया जाता हैइस प्रकार के यंत्र को पर्स में रखने से अनावश्यक खर्च में कमी होती है तथा आय के नए माध्यमों का आभास होता है.

भोजपत्र श्रीयंत्र

आजकल इस प्रकार के यंत्र दुर्लभ होते जा रहे हैंइन पर निर्मित यंत्रों का प्रयोग ताबीज के अंदर डालने के लिए किया जाता हैइस प्रकार के यंत्र सस्ते तथा प्रभावशाली होते हैं.

उपरोक्त पदार्थों का उपयोग यंत्र निर्माण के लिए करना श्रेष्ठ हैलकडीकपडा या पत्थर आदि पर श्री यंत्र का निर्माण न करना श्रेष्ठ रहता है.

श्री यंत्र के निर्माण के समान ही इसका पूजन भी श्रम साध्य होने के साथ-साथ विशेष तेजस्विता की अपेक्षा भी रखता हैकोई भी श्रेष्ठ कार्य करने के लिए श्रेष्ठ मुहूर्त का होना भी अनिवार्य होता हैश्री यंत्र की प्राण प्रतिष्ठा के निमित्त श्रेष्ठतम मुहूर्तों पर एक दृष्टिपात करते हुए पूजन विधि पर प्रकाश डालने का प्रयास करूंगा.

श्रेष्ठ मुहूर्त

श्री यंत्र के निर्माण व पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ मुहुर्त है कालरात्रि अर्थात दीपावली की रात्रिइस रात्रि में स्थिर लग्न में यंत्र का निर्माण व पूजन संपन्न किया जाना चाहिये.

इसके बाद माघ माह की पूर्णिमाशिवरात्रिशरद पूर्णिमासूर्यग्रहण या चंद्रग्रहण का मुहूर्त श्रेष्ठ होता हैयद्यपि ग्रहण को सामान्यतः शुभ कर्मों के लिए प्रयोग नही किया जाता इसलिए यहां संदेह होना स्वाभाविक हैमगर श्री विद्या पूर्णते तांत्रोक्त विद्या है तथा तांत्रोक्त साधनाओं के लिए ग्रहण को श्रेष्ठतम मुहूर्त मान गया है.

उपरोक्त मुहूर्तों के अलावा अक्षय तृतीयारवि पुष्य योगगुरू पुष्य योगआश्विन माह को छोडकर किसी भी अमावस्या या किसी भी पूर्णिमा को भी श्रेष्ठ समय मे यंत्र निर्माण व पूजन किया जा सकता है.

यहां मैं यह स्पष्ट कर देना अनिवार्य समझता हूं किसभी तांत्रोक्त विधानों की तरहयदि श्री यंत्र का निर्माण तथा पूजन करने वालाश्री विद्या का सिद्ध साधक या गुरू होतो उनके द्वारा निर्दिष्ट समय उपरोक्त मुहूर्तों से भी ज्यादा श्रेष्ठ तथा फलदायक होगाकिसी भी पूजन की विधि से ज्यादा महत्व पूजन को संपन्न कराने वाले साधक की साधनात्मक तेजस्विता का होता हैयदि पूजनकर्ता की साधनात्मक उर्जा नगण्य है तो पूजन और प्राण-प्रतिष्ठा अर्थहीन हो जाएगीइसलिए श्री यंत्र के पूजन से पहले पूजनकर्ता के लिए यह आवश्यक है किवह कम से कम एक बार श्री विद्या या महालक्ष्मी मंत्र का पुरश्चरण पूर्ण कर चुका हो.

पूजन विधि

सबसे पहले शुद्ध जल से स्नान करके पूर्व दिशा की ओर देखते हुए बैठ जायेंसामने यंत्र को स्थापित करें.

  1. सर्वप्रथम ÷क्क श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमेसे आचमन करें .

  2. पवित्री करण करें.

  3. संकल्प लें अपनी कामना को व्यक्त करें.

  4. भूमि पूजन करें.

  5. गणपति पूजन करें.

  6. भैरव पूजन करें.

  7. गुरू पूजन करें.

  8. भूतशुद्धि करेंइसके लिए पुरूष सूक्त का पाठ करें.

  9. घी का दीपक जलायें.

  10. ऋष्यादिन्यासकरन्यास तथा अंगन्यास संपन्न करें.

  11. श्री विद्या का ध्यान करने के बाद श्री सूक्त के सोलह पाठ संपन्न करें.

  12. इसके पश्चात लक्ष्मी सूक्त का एक पाठ संपन्न करें.

  13. श्री सूक्त के सोलह श्लोकों से श्री यंत्र का षोडशोचार पूजन संपन्न करें.

  14. प्रत्येक श्लोक के साथ यंत्र के मध्य में केसर से बिंदी लगायें जैसे आप षोडशी की सोलह कलाओं को वहां स्थापित कर रहे हों.

  15. अंत में श्री सूक्त के सोलह श्लोकों के साथ आहुति संपन्न करेंविधान १००० बार पाठ तथा १०० बार हवन का है.

  16. इसमें प्रत्येक श्लोक के साथ स्वाहा लगाकर आहुति देंगें.


    मालामाल बनाती है श्रीयंत्र पूजा:


    धन या पैसा जीवन की अहम जरुरतों में एक है। आज तेज रफ्तार के जीवन में कईं अवसरों पर यह देखा जाता है कि युवा पीढ़ी चकाचौंध से भरी जीवनशैली को देखकर प्रभावित होती है और बहुत कम समय में ज्यादा कमाने की सोच में गलत तरीकें अपनाती है। जबकि धन का वास्तविक सुख और शांति मेहनत, परिश्रम की कमाई में ही है। ऐसा कमाया धन न केवल आत्मविश्वास के साथ दूसरों का भरोसा भी देता है, बल्कि रुतबा और साख भी बनाता है।

    धर्म में आस्था रखने वाला व्यक्ति ऐसे ही तरीकों में विश्वास रखता है। इसलिए मातृशक्ति की आराधना के इस काल में यहां बताया जा रहा है, एक ऐसा ही उपाय जिसको अपनाकर जीवन में किसी भी सुख से वंचित नहीं रहेंगे और धन का अभाव कभी नहीं सताएगा। यह उपाय है श्रीयंत्र पूजा।

    धार्मिक दृष्टि से लक्ष्मी कृपा के लिए की जाने वाली श्रीयंत्र साधना संयम और नियम की दृष्टि से कठिन होती है। इसलिए यहां बताई जा रही है श्रीयंत्र पूजा की सरल विधि जिसे कोई भी साधारण भक्त अपनाकर सुख और वैभव पा सकता है। सरल शब्दों में यह पूजा मालामाल बना देती है। श्रीयंत्र पूजा की आसान विधि कोई भी भक्त नवरात्रि या उसके बाद भी शुक्रवार या प्रतिदिन कर सकता है।

    श्रीयंत्र पूजा के पहले कुछ सामान्य नियमों का जरुर पालन करें - 

    - ब्रह्मचर्य का पालन करें और ऐसा करने का प्रचार न करें। 

    - स्वच्छ वस्त्र पहनें।

    - सुगंधित तेल, परफ्यूम, इत्र न लगाएं।

    - बिना नमक का आहार लें। 

    - प्राण-प्रतिष्ठित श्रीयंत्र की ही पूजा करें। यह किसी भी मंदिर, योग्य और सिद्ध ब्राह्मण, ज्योतिष या तंत्र विशेषज्ञ से प्राप्त करें। 

    - यह पूजा लोभ के भाव से न कर सुख और शांति के भाव से करें। इसके बाद श्रीयंत्र पूजा की इस विधि से करें। इसे किसी योग्य ब्राह्मण से भी करा सकते हैं - नवरात्रि या किसी भी दिन सुबह स्नान कर एक थाली में श्रीयंत्र स्थापित करें। 

    - इस श्रीयंत्र को लाल कपड़े पर रखें। 

    - श्रीयंत्र का पंचामृत यानि दुध, दही, शहद, घी और शक्कर को मिलाकर स्नान कराएं। गंगाजल से पवित्र स्नान कराएं।

    - इसके बाद श्रीयंत्र की पूजा लाल चंदन, लाल फूल, अबीर, मेंहदी, रोली, अक्षत, लाल दुपट्टा चढ़ाएं। मिठाई का भोग लगाएं।

    - धूप, दीप, कर्पूर से आरती करें। 

    - श्रीयंत्र के सामने लक्ष्मी मंत्र, श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती या जो भी श्लोक आपको आसान लगे, का पाठ करें। किंतु लालच, लालसा से दूर होकर श्रद्धा और पूरी आस्था के साथ करें।

    - अंत में पूजा में जाने-अनजाने हुई गलती के लिए क्षमा मांगे और माता लक्ष्मी का स्मरण कर सुख, सौभाग्य और समृद्धि की कामना करें। श्रीयंत्र पूजा की यह आसान विधि नवरात्रि में बहुत ही शुभ फलदायी मानी जाती है। इससे नौकरीपेशा से लेकर बिजनेसमेन तक धन का अभाव नहीं देखते। इसे प्रति शुक्रवार या नियमित करने पर जीवन में आर्थिक कष्टों का सामना नहीं करना पड़ता।


    श्री यंत्र

    यह सर्वाधिक लोकप्रिय प्राचीन यन्त्र है,इसकी अधिष्टात्री देवी स्वयं श्रीविद्या अर्थात त्रिपुर सुन्दरी हैं,और उनके ही रूप में इस यन्त्र की मान्यता है। यह बेहद शक्तिशाली ललितादेवी का पूजा चक्र है,इसको त्रैलोक्य मोहन अर्थात तीनों लोकों का मोहन यन्त्र भी कहते है। यह सर्व रक्षाकर सर्वव्याधिनिवारक सर्वकष्टनाशक होने के कारण यह सर्वसिद्धिप्रद सर्वार्थ साधक सर्वसौभाग्यदायक माना जाता है। इसे गंगाजल और दूध से स्वच्छ करने के बाद पूजा स्थान या व्यापारिक स्थान तथा अन्य शुद्ध स्थान पर रखा जाता है। इसकी पूजा पूरब की तरफ़ मुंह करके की जाती है,श्रीयंत्र का सीधा मतलब है,लक्ष्मी यंत्र जो धनागम के लिये जरूरी है। इसके मध्य भाग में बिन्दु व छोटे बडे मुख्य नौ त्रिकोण से बने ४३ त्रिकोण दो कमल दल भूपुर एक चतुरस ४३ कोणों से निर्मित उन्नत श्रंग के सद्रश्य मेरु प्रुष्ठीय श्रीयंत्र अलौकिक शक्ति व चमत्कारों से परिपूर्ण गुप्त शक्तियों का प्रजनन केन्द्र बिद्नु कहा गया है। जिस प्रकार से सब कवचों से चन्डी कवच सर्वश्रेष्ठ कहा गया है,उसी प्रकार से सभी देवी देवताओं के यंत्रों में श्रीदेवी का यंत्र सर्वश्रेष्ठ कहा गया है। इसी कारण से इसे यंत्रराज की उपाधि दी गयी है। इसे यन्त्रशिरोमणि भी कहा जाता है। दीपावली धनतेरस बसन्त पंचमी अथवा पौष मास की संक्रान्ति के दिन यदि रविवार हो तो इस यंत्र का निर्माण व पूजन विशेष फ़लदायी माना गया है,ऐसा मेरा विश्वास है।

    श्री महालक्ष्मी यंत्र

    श्री महालक्षमी यंत्र की अधिष्ठात्री देवी कमला हैं,अर्थात इस यंत्र का पूजन करते समय श्वेत हाथियों के द्वारा स्वर्ण कलश से स्नान करती हुयी कमलासन पर बैठी लक्ष्मी का ध्यान करना चाहिये,विद्वानों के अनुसार इस यंत्र के नित्य दर्शन व पूजन से लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। इस यंत्र की पूजा वेदोक्त न होकर पुराणोक्त है इसमे बिन्दु षटकोण वृत अष्टदल एवं भूपुर की संरचना की गयी है,धनतेरस दीवावली बसन्त पंचमी रविपुष्य एवं इसी प्रकार के शुभ योगों में इसकी उपासना का महत्व है,स्वर्ण रजत ताम्र से निर्मित इस यन्त्र की उपासना से घर व स्थान विशेष में लक्ष्मी का स्थाई निवास माना जाता है।

    बगलामुखी यंत्र

    बगला दस महाविद्याओं में एक है इसकी उपासना से शत्रु का नाश होता है,शत्रु की जिव्हा वाणी व वचनों का स्तम्भन करने हेतु इससे बढकर कोई यंत्र नही है। इस यंत्र के मध्य बिंदु पर बगलामुखी देवी का आव्हान व ध्यान करना पडता है,इसे पीताम्बरी विद्या भी कहते हैं,क्योंकि इसकी उपासना में पीले वस्त्र पीले पुष्प पीली हल्दी की माला एवं केशर की खीर का भोग लगता है। इस यंत्र में बिन्दु त्रिकोण षटकोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडशदल एवं भूपुर की रचना की गयी है,नुकसान पहुंचाने वाले दुष्ट शत्रु की जिव्हा हाथ से खींचती हुयी बगलादेवी का ध्यान करते हुये शत्रु के सर्वनाश की कल्पना की जाती है। इस यंत्र के विशेष प्रयोग से प्रेतबाधा व यक्षिणीबाधा का भी नाश होता है।

    श्रीमहाकाली यन्त्र

    शमशान साधना में काली उपासना का बडा भारी महत्व है,इसी सन्दर्भ में महाकाली यन्त्र का प्रयोग शत्रु नाश मोहन मारण उच्चाटन आदि कार्यों में किया जाता है। मध्य बिन्दु में पांच उल्टे त्रिकोण तीन वृत अष्टदल वृत एव भूपुर से आवृत महाकाली का यंत्र तैयार होता है। इस यंत्र का पूजन करते समय शव पर आरूढ मुण्डमाला धारण की हुयी कडग त्रिशूल खप्पर व एक हाथ में नर मुण्ड धारण की हुयी रक्त जिव्हा लपलपाती हुयी भयंकर स्वरूप वाली महाकाली का ध्यान किया जाता है। जब अन्य विद्यायें असफ़ल होजातीं है,तब इस यंत्र का सहारा लिया जाता है। महाकाली की उपासना अमोघ मानी गयी है। इस यंत्र के नित्य पूजन से अरिष्ट बाधाओं का स्वत: ही नाश हो जाता है,और शत्रुओं का पराभव होता है,शक्ति के उपासकों के लिये यह यंत्र विशेष फ़लदायी है। चैत्र आषाढ अश्विन एवं माघ की अष्टमी इस यंत्र के स्थापन और महाकाली की साधना के लिये अतिउपयुक्त है।

    महामृत्युंजय यंत्र

    इस यंत्र के माध्यम से मृत्यु को जीतने वाले भगवान शंकर की स्तुति की गयी है,भगवान शिव की साधना अमोघ व शीघ्र फ़लदायी मानी गयी है। आरक दशाओं के लगने के पूर्व इसके प्रयोग से व्यक्ति भावी दुर्घटनाओं से बच जाता है,शूल की पीडा सुई की पीडा में बदल कर निकल जाती है। प्राणघातक दुर्घटना व सीरियस एक्सीडेंट में भी जातक सुरक्षित व बेदाग होकर बच जाता है। प्राणघातक मार्केश टल जाते हैं,ज्योतिषी लोग अरिष्ट ग्रह निवारणार्थ आयु बढाने हेतु अपघात और अकाल मृत्यु से बचने के लिये महामृत्युयंत्र का प्रयोग करना बताते हैं। शिवार्चन स्तुति के अनुसार पंचकोण षटकोण अष्टदल व भूपुर से युक्त मूल मन्त्र के बीच सुशोभित महामृत्युंजय यंत्र होता है। आसन्न रोगों की निवृत्ति के लिये एवं दीर्घायु की कामना के लिये यह यंत्र प्रयोग में लाया जाता है। इस यंत्र का पूजन करने के बाद इसका चरणामृत पीने से व्यक्ति निरोग रहता है,इसका अभिषिक्त किया हुआ जल घर में छिडकने से परिवार में सभी स्वस्थ रहते हैं,घर पर रोग व ऊपरी हवाओं का आक्रमण नहीं होता है।

    कनकधारा यंत्र

    लक्ष्मी प्राप्ति के लिये यह अत्यन्त दुर्लभ और रामबाण प्रयोग है,इस यंत्र के पूजन से दरिद्रता का नाश होता है,पूर्व में आद्य शंकराचार्य ने इसी यंत्र के प्रभाव से स्वर्ण के आंवलों की वर्षा करवायी थी। यह यंत्र रंक को राजा बनाने की सामर्थय रखता है। यह यंत्र अष्ट सिद्धि व नव निधियों को देने वाला है,इसमें बिन्दु त्रिकोण एवं दो वृहद कोण वृत्त अष्टदल वृत्त षोडस दल एव तीन भूपुर होते हैं,इस यंत्र के साथ कनकधारा स्तोत्र का पाठ करना अनिवार्य होता है।

    श्रीदुर्गा यंत्र

    यह श्री दुर्गेमाता अम्बेमाता का यंत्र है,इसके मूल में नवार्ण मंत्र की प्रधानता है,श्री अम्बे जी का ध्यान करते हुये नवार्ण मंत्र माला जपते रहने से इच्छित फ़ल की प्राप्ति होती है। विशेषकर संकट के समय इस यंत्र की प्रतिष्ठा करके पूजन किया जाता है। नवरात्र में स्थापना के दिन अथवा अष्टमी के दिन इस यंत्र निर्माण करना व पूजन करना विशेष फ़लदायी माना जाता है,इस यन्त्र पर दुर्गा सप्तशती के अध्याय चार के श्लोक १७ का जाप करने पर दुख व दरिद्रता का नाश होता है। व्यक्ति को ऋण से दूर करने बीमारी से मुक्ति में यह यंत्र विशेष फ़लदायी है।

    सिद्धि श्री बीसा यंत्र

    कहावत प्रसिद्ध है कि जिसके पास हो बीसा उसका क्या करे जगदीशा,अर्थात साधकों ने इस यंत्र के माध्यम से दुनिया की हर मुश्किल आसान होती है,और लोग मुशीबत में भी मुशीबत से ही रास्ता निकाल लेते हैं। इसलिये ही इसे लोग बीसा यंत्र की उपाधि देते हैं। नवार्ण मंत्र से सम्पुटित करते हुये इसमे देवी जगदम्बा का ध्यान किया जाता है। यंत्र में चतुष्कोण में आठ कोष्ठक एक लम्बे त्रिकोण की सहायता से बनाये जाते हैं,त्रिकोण को मन्दिर के शिखर का आकार दिया जाता है,अंक विद्या के चमत्कार के कारण इस यंत्र के प्रत्येक चार कोष्ठक की गणना से बीस की संख्या की सिद्धि होती है। इस यंत्र को पास रखने से ज्योतिषी आदि लोगों को वचन सिद्धि की भी प्राप्ति होती है। भूत प्रेत और ऊपरी हवाओं को वश में करने की ताकत मिलती है,जिन घरों में भूत वास हो जाता है उन घरों में इसकी स्थापना करने से उनसे मुक्ति मिलती है।

    श्री कुबेर यंत्र

    यह धन अधिपति धनेश कुबेर का यंत्र है,इस यंत्र के प्रभाव से यक्षराज कुबेर प्रसन्न होकर अतुल सम्पत्ति की रक्षा करते हैं। यह यंत्र स्वर्ण और रजत पत्रों से भी निर्मित होता है,जहां लक्ष्मी प्राप्ति की अन्य साधनायें असफ़ल हो जाती हैं,वहां इस यंत्र की उपासना से शीघ्र लाभ होता है। कुबेर यंत्र विजय दसमीं धनतेरस दीपावली तथा रविपुष्य नक्षत्र और गुरुवार या रविवार को बनाया जाता है। कुबेर यंत्र की स्थापना गल्ले तिजोरियों सेफ़ व बन्द अलमारियों में की जाती है। लक्ष्मी प्राप्ति की साधनाओं में कुबेर यंत्र अपना महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

    श्री गणेश यंत्र

    गणेश यंत्र सर्व सिद्धि दायक व नाना प्रकार की उपलब्धियों व सिद्धियों के देने वाला है,इसमें देवताओं के प्रधान गणाध्यक्ष गणपति का ध्यान किया जाता है। एक हाथ में पास एक अंकुश एक में मोदक एवं वरद मुद्रा में सुशोभित एक दन्त त्रिनेत्र कनक सिंहासन पर विराजमान गणपति की स्तुति की जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से और भक्त की आराधना से व्यक्ति विशेष पर रिद्धि सिद्धि की वर्षा करते हैं,साधक को इष्ट कृपा की अनुभूति होने लगती है। उसके कार्यों के अन्दर आने वाली बाधायें स्वत: ही समाप्त हो जातीं हैं,व्यक्ति को अतुल धन यश कीर्ति की प्राप्ति होती है,रवि पुष्य गुरु पुष्य अथवा गणेश चतुर्थी को इस यंत्र का निर्माण किया जाता है,इन्ही समयों में इस यंत्र की पूजा अर्चना करने पर सभी कामनायें सिद्धि होती हैं।

    गायत्री यंत्र

    गायत्री की महिमा शब्दातीत है,इस यंत्र को बनाते समय कमल दल पर विराजमान पद्मासन में स्थिति पंचमुखी व अष्टभुजा युक्त गायत्री का ध्यान किया जाता है,बिन्दु त्रिकोण षटकोण व अष्टदल व भूपुर से युक्त इस यंत्र को गायत्री मंत्र से प्रतिष्ठित किया जाता है। इस यंत्र की उपासना से व्यक्ति लौकिक उपलब्धियों को लांघ कर आध्यात्मिक उन्नति को स्पर्श करने लग जाता है। व्यक्ति का तेज मेधा व धारणा शक्ति बढ जाती है। इस यंत्र के प्रभाव से पूर्व में किये गये पाप कर्मों से मुक्ति मिल जाती है। गायत्री माता की प्रसन्नता से व्यक्ति में श्राप व आशीर्वाद देने की शक्ति आ जाती है। व्यक्ति की वाणी और चेहरे पर तेज बढने लगता है। गायत्री का ध्यान करने के लिये सुबह को माता गायत्री श्वेत कमल पर वीणा लेकर विराजमान होती है,दोपहर को गरूण पर सवार लाल वस्त्रों में होतीं है,और शाम को सफ़ेद बैल पर सवार वृद्धा के रूप में पीले वस्त्रों में ध्यान में आतीं हैं।

    दाम्पत्य सुख कारक मंगल यंत्र

    विवाह योग्य पुत्र या पुत्री के विवाह में बाधा आना,विवाह के लिये पुत्र या पुत्री का सीमाओं को लांघ कर सामाजिक मर्यादा को तोडना विवाह के बाद पति पत्नी में तकरार होना,विवाहित दम्पत्ति के लिये किसी न किसी कारण से सन्तान सुख का नहीं होना,गर्भपात होकर सन्तान का नष्ट हो जाना, मनुष्य का ध्यान कर्ज की तरफ़ जाना और लिये हुये कर्जे को चुकाने के लिये दर दर की ठोकरें खाना,किसी को दिये गये कर्जे का वसूल नहीं होना,आदि कारणों के लिये ज्योतिष शास्त्र में मंगल व्रत का विधान है,मंगल के व्रत में मंगल यंत्र का पूजन आवश्यक है। यह यंत्र जमीन जायदाद के विवाद में जाने और घर के अन्दर हमेशा क्लेश रहने पर भी प्रयोग किया जाता है,इसके अलावा इसे वाहन में प्रतिष्ठित कर लगाने से दुर्घटना की संभावना न के बराबर हो जाती है।

    श्री पंचदसी यंत्र

    पंचदसी यंत्र को पन्द्रहिया यन्त्र भी कहा जाता है,इसके अन्दर एक से लेकर नौ तक की संख्याओं को इस प्रकार से लिखा जाता है दायें बायें ऊपर नीचे किधर भी जोडा जाये तो कुल योग पन्द्रह ही होता है,इस यन्त्र का निर्माण राशि के अनुसार होता है,एक ही यन्त्र को सभी राशियों वाले लोग प्रयोग नहीं कर सकते है,पूर्ण रूप से ग्रहों की प्रकृति के अनुसार इस यंत्र में पांचों तत्वों का समावेश किया जाता है,जैसे जल तत्व वाली राशियां कर्क वृश्चिक और मीन होती है,इन राशियों के लिये चन्द्रमा का सानिध्य प्रारम्भ में और मंगल तथा गुरु का सानिध्य मध्य में तथा गुरु का सानिध्य अन्त में किया जाता है। संख्यात्मक प्रभाव का असर साक्षात देखने के लिये नौ में चार को जोडा जाता है,फ़िर दो को जोड कर योग पन्द्रह का लिया जाता है,इसके अन्दर मंगल को दोनों रूपों में प्रयोग में लाया जाता है,नेक मंगल या सकारात्मक मंगल नौ के रूप में होता है और नकारात्मक मंगल चार के रूप में होता है,तथा चन्द्रमा का रूप दो से प्रयोग में लिया जाता है। यह यंत्र भगवान शंकर का रूप है,ग्यारह रुद्र और चार पुरुषार्थ मिलकर ही पन्द्रह का रूप धारण करते है। इस यंत्र को सोमवार या पूर्णिमा के दिन बनाया जाता है,और उसे रुद्र गायत्री से एक बैठक में पन्द्रह हजार मंत्रों से प्रतिष्टित किया जाता है।

    सम्पुटित गायत्री यंत्र

    वेदमाता गायत्री विघ्न हरण गणपति महाराज समृद्धिदाता श्री दत्तात्रेय के सम्पुटित मंत्रों द्वारा इस गायत्री यंत्र का निर्माण किया जाता है। यह यंत्र व्यापारियों गृहस्थ लोगों के लिये ही बनाया जाता है इसका मुख्य उद्देश्य धन,धन से प्रयोग में लाये जाने वाले साधन और धन को प्रयोग में ली जाने वाली विद्या का विकास इसी यंत्र के द्वारा होता है,जिस प्रकार से एक गाडी साधन रूप में है,गाडी को चलाने की कला विद्या के रूप में है,और गाडी को चलाने के लिये प्रयोग में ली जाने वाली पेट्रोल आदि धन के रूप में है,अगर तीनों में से एक की कमी हो जाती है तो गाडी रुक जाती है,उसी प्रकार से व्यापारियों के लिये दुकान साधन के रूप में है,दुकान में भरा हुआ सामान धन के रूप में है,और उस सामान को बेचने की कला विद्या के रूप में है,गृहस्थ के लिये भी परिवार का सदस्य साधन के रूप में है,सदस्य की शिक्षा विद्या के रूप में है,और सदस्य द्वारा अपने को और अपनी विद्या को प्रयोग में लाने के बाद पैदा किया जाने फ़ल धन के रूप में मिलता है,इस यंत्र की स्थापना करने के बाद उपरोक्त तीनों कारकों का ज्ञान आसानी से साधक को हो जाता है,और वह किसी भी कारक के कम होने से पहले ही उसे पूरा कर लेता है।

    श्री नित्य दर्शन बीसा यंत्र

    इस यंत्र का निर्माण अपने पास हमेशा रखने के लिये किया जाता है,इसके अन्दर पंचागुली महाविद्या का रोपण किया जाता है,अष्टलक्ष्मी से युक्त इस यंत्र का निर्माण करने के बाद इसे चांदी के ताबीज में रखा जाता है,जब कोई परेशानी आती है तो इसे माथे से लगाकर कार्य का आरम्भ किया जाता है,कार्य के अन्दर आने वाली बाधा का निराकरण बाधा आने के पहले ही दिमाग में आने लगता है,इसे शराबी कबाबी लोग अपने प्रयोग में नही ला सकते हैं।







(Then what others to do ? )

.......................1] Register today for eyes donation,

.......................2] Donate blood,

.......................3] make a loaf compulsory for cows,

.......................4] Produce chances for employment to others,

.......................5] Make shelters for old age people, for widows and for poors,

.......................6] Make hospitals for needy patients,

.......................7] If you can't make,....... try to contribute in the form of money, medicines and ration.


  • क्यों व्यर्थ की चिंता करते हो? किससे व्यर्थ डरते हो? कौन तुम्हें मार सक्ता है? आत्मा ना पैदा होती है, न मरती है।
  • जो हुआ, वह अच्छा हुआ, जो हो रहा है, वह अच्छा हो रहा है, जो होगा, वह भी अच्छा ही होगा। तुम भूत का पश्चाताप न करो। भविष्य की चिन्ता न करो। वर्तमान चल रहा है।
  • तुम्हारा क्या गया, जो तुम रोते हो? तुम क्या लाए थे, जो तुमने खो दिया? तुमने क्या पैदा किया था, जो नाश हो गया? न तुम कुछ लेकर अाए, जो लिया यहीं से लिया। जो दिया, यहीं पर दिया। जो लिया, इसी (भगवान) से लिया। जो दिया, इसी को दिया।
  • खाली हाथ आए और खाली हाथ चले। जो आज तुम्हारा है, कल और किसी का था, परसों किसी और का होगा। तुम इसे अपना समझ कर मग्न हो रहे हो। बस यही प्रसन्नता तुम्हारे दु:खों का कारण है।
  • परिवर्तन संसार का नियम है। जिसे तुम मृत्यु समझते हो, वही तो जीवन है। एक क्षण में तुम करोड़ों के स्वामी बन जाते हो, दूसरे ही क्षण में तुम दरिद्र हो जाते हो। मेरा-तेरा, छोटा-बड़ा, अपना-पराया, मन से मिटा दो, फिर सब तुम्हारा है, तुम सबके हो।
  • न यह शरीर तुम्हारा है, न तुम शरीर के हो। यह अग्नि, जल, वायु, पृथ्वी, आकाश से बना है और इसी में मिल जायेगा। परन्तु आत्मा स्थिर है - फिर तुम क्या हो?
  • तुम अपने अापको भगवान के अर्पित करो। यही सबसे उत्तम सहारा है। जो इसके सहारे को जानता है वह भय, चिन्ता, शोक से सर्वदा मुक्त है।
  • जो कुछ भी तू करता है, उसे भगवान के अर्पण करता चल। ऐसा करने से सदा जीवन-मुक्त का आनंन्द अनुभव करेगा।



ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्रं, प्रजापतेयर्त्सहजं पुरस्तात् ।
आयुष्यमग्र्यं प्रतिमुञ्च शुभ्रं, यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः॥ -पार० गृ०सू० २.२.११

जब बालक का शारीरिक-मानसिक विकास इस योग्य हो जाए कि वह अपने विकास के लिए आत्मनिर्भर होकर संकल्प एवं प्रयास करने लगे, तब उसे श्रेष्ठ आध्यात्मिक एवं सामाजिक अनुशासनों के निर्वाह के लिए अनुबंधित-संकल्पित कराया जाता है । दीक्षा का अर्थ होता है किसी श्रेष्ठ लक्ष्य तक पहुँचने के सुनिश्चित संकल्प के साथ उसके लिए निर्धारित साधना में प्रवृत्त होना । मनुष्य सांस्सारिक कार्यों में उलझ कर, कहीं जीवन के श्रेष्ठ लक्ष्यों की उपेक्षा न करने लगे, लौकिक के साथ आध्यात्मिक लक्ष्यों की ओर जागरूक और सचेष्ट रहे, इस दृष्टि से दीक्षा संस्कार संकल्प के साथ यज्ञोपवीत संस्कार कराया जाता है । पुरातन काल में गुरुकुल में दोनों संस्कार एक साथ ही होते थे, वर्तमान समय में मनःस्थति एवं परिस्थितियों के अनुसार इन्हें अलग-अलग या एक साथ सम्पन्न कराया जा सकता है ।

संस्कार प्रयोजन

शिखा और सूत्र भारतीय संस्कृति के दो सर्वमान्य प्रतीक है । शिखा भारतीय संस्कृति के प्रति आस्था की प्रतीक है, जो मुण्डन संस्कार के समय स्थापित की जाती है । यज्ञोपवीत सांस्कृतिक मूल्यों के आधार पर अपने जीवन में आमूलचूल परिवर्तन के संकल्प का प्रतीक है । इसके साथ ही गायत्री मंत्र की गुरुदीक्षा भी दी जाती है । दीक्षा यज्ञोपवीत मिलकर द्विजत्व का संस्कार पूरा करते हैं । इसका अर्थ होता है- 'दूसरा जन्म' । शास्त्रवचन है- 'जन्मना जायते शूद्रः संस्कारद् द्विज उच्यते॥'

जन्म से मनुष्य एक प्रकार का पशु ही है । उसमें स्वार्थपरता की वृत्ति अन्य जीवन-जन्तुओं जैसी ही होती है, पर उत्कृष्ट आदर्शवादी मान्यताओं द्वारा वह मनुष्य बनता है । जब मानव की आस्था यह बन जाती है कि उसे इन्सान की तरह ऊँचा जीवन जीना है और उसी आधार पर वह अपनी कार्य पद्धति निर्धारित करता है, तभी कहा जा सकता है कि इसने पशु-योनि छोड़कर मनुष्य योनि में प्रवेश किया है । अन्यथा नर-नारियों से तो यह संसार भरा पड़ा है । स्वार्थ की संकीर्णता से निकलकर परमार्थ की महानता में प्रवेश करने को, पशुता को त्याग कर मनुष्यता ग्रहण करने को दूसरा जन्म कहते हैं । शरीर जन्म माता-पिता के रज-वीर्य से वैसा ही होता है, जैसा अन्य जीवों का । आदर्शवादी जीवन लक्ष्य अपना लेने की प्रतिज्ञा करना ही वास्तविक मनुष्य जन्म में प्रवेश करना है । इसी को द्विजत्व कहते हैं । द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म । हर हिन्दू धमार्नुयायी को आदर्शवादी जीवन जीना चाहिए, द्विज बनना चाहिए । इस मूल तथ्य को अपनाने की प्रक्रिया को समारोहपूर्वक यज्ञोपवीत संस्कार के नाम से सम्पन्न किया जाता है । इस व्रत बंधन को आजीवन स्मरण रखने और व्यवहार में लाने की प्रतिज्ञा का प्रतीक तीन लड़ों वाला यज्ञोपवीत कन्धे पर डाले रहना होता है । यज्ञोपवीत बालक को तब देना चाहिए, जब उसकी बुद्धि और भावना का इतना विकास हो जाए कि इस संस्कार के प्रयोजन को समझकर उसके निवार्ह के लिए उत्साहपूर्वक लग सके ।

यज्ञोपवीत से सम्बन्धित स्थूल-सूक्ष्म मयार्दाएँ

१- यज्ञोपवीत गायत्री की मूर्तिमान प्रतिमा है । गायत्री त्रिपदा है, गायत्री मन्त्र में तीन चरण हैं, इसी आधार पर यज्ञोपवीत में तीन लड़ें हैं । यज्ञोपवीत की प्रत्येक लड़ में तीन धागे होते हैं । यज्ञोपवीत में तीन गाँठों को भूः, भुवः स्वः तीन व्याहृतियाँ माना गया है । गायत्री के 'ॐ कार' को बड़ी ब्रह्म ग्रन्थि कहा गया है । गायत्री के एक-एक पद को लेकर ही उपवीत की रचना हुई है । इस प्रतिमा को शरीर मन्दिर में स्थापित करने पर उसकी पूजा-अर्चना करने का उत्तरदायित्व भी स्वीकार करना होता है । इसके लिए नित्य कम से कम एक माला गायत्री मन्त्र जप की साधना करनी चाहिए ।

२- यज्ञोपवीत को व्रत बन्ध कहते हैं । व्रतों से बँधे बिना मनुष्य का उत्थान सम्भव नहीं । यज्ञोपवीत को व्रतशीलता का प्रतीक मानते हैं । इसीलिए इसे सूत्र (फार्मूला, सहारा) भी कहते हैं । यज्ञोपवीत के नौ धागे नौ गुणों के प्रतीक हैं । प्रत्येक धारण करने वाले को इन गुणों को अपने में बढ़ाने का निरन्तर ध्यान बना रहे, यह स्मरण जनेऊ के धागे दिलाते रहते हैं ।

यज्ञोपवीत के धागों में नीति का सम्पूर्ण सार सन्निहित कर दिया गया है । जैसे कागज का स्याही के सहारे किसी नगण्य से पत्र या तुच्छ सी लगने वाली पुस्तक में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ज्ञान-विज्ञान भर दिया जाता है, उसी प्रकार सूत्र के इन नौ धागों में जीवन-विकास का सारा मार्गदर्शन समाविष्ट कर दिया गया है । इन धागों को कन्धे पर, कलेजे पर, हृदय पर, पीठ पर प्रतिष्ठित करने का प्रयोजन यह है कि सन्निहित शिक्षा का यज्ञोपवीत के धागे स्मरण कराते रहें, ताकि उन्हें जीवन व्यवहार में उतारा जा सके । यज्ञोपवीत को माँ गायत्री और यज्ञ पिता की संयुक्त प्रतिमा मानते हैं ।

मर्यादा के नियम

(१) यज्ञोपवीत को मल-मूत्र विसर्जन के पूर्व दाहिने कान पर चढ़ा लेना चाहिए और हाथ स्वच्छ करके ही उतारना चाहिए । इसका स्थूल भाव यह है कि यज्ञोपवीत कमर से ऊँचा हो जाए और अपवित्र न हो । अपने व्रतशीलता के संकल्प का ध्यान इसी बहाने बार-बार किया जाए ।
(२) यज्ञोपवीत का कोई तार टूट जाए या ६ माह से अधिक समय हो जाए, तो बदल देना चाहिए । खण्डित प्रतिमा शरीर पर नहीं रखते । धागे कच्चे और गंदे होने लगें, तो पहले ही बदल देना उचित है ।
(३) जन्म-मरण के सूतक के बाद इसे बदल देने की परम्परा है । जिनके गोद में छोटे बच्चे नहीं हैं, वे महिलाएँ भी यज्ञोपवीत सँभाल सकती हैं; किन्तु उन्हें हर मास मासिक शौच के बाद उसे बदल देना पड़ता है ।
(४) यज्ञोपवीत शरीर से बाहर नहीं निकाला जाता । साफ करने के लिए उसे कण्ठ में पहने रहकर ही घुमाकर धो लेते हैं । भूल से उतर जाए, तो प्रायश्चित की एक माला जप करने या बदल लेने का नियम है ।
(५) देव प्रतिमा की मर्यादा बनाये रखने के लिए उसमें चाबी के गुच्छे आदि न बाँधें । इसके लिए भिन्न व्यवस्था रखें । बालक जब इन नियमों के पालन करने योग्य हो जाएँ, तभी उनका यज्ञोपवीत करना चाहिए ।

यज्ञोपवीत भारतीय धर्म का पिता है और गायत्री भारतीय संस्कृति की माता, दोनों का जोड़ा है । यज्ञ पिता को कन्धे पर और गायत्री माता को हृदय में एक साथ धारण किया जाता है । गायत्री प्रत्येक भारतीय धर्मानुयायी का गुरु मन्त्र है । उसे यज्ञोपवीत के समय पर ही विधिवत् ग्रहण करना चाहिए । आज उस स्तर के गुरु दीख नहीं पड़ते, जो स्वयं पार हो चले हों और दूसरों को अपनी नाव पर बिठा कर पार लगा सकें । जिधर भी दृष्टि डाली जाती है, नकलीपन और धोखा ही भरा मिलता है । अस्तु, यह अच्छा है कि व्यक्तियों को गुरु न बनाया जाए । अन्तःकरण के प्रकाश को तथा प्रत्यक्ष में ज्ञान-यज्ञ की दिव्य ज्योति-लाल मशाल को सद्गुरु माना जाए और यज्ञोपवीत के समय शुद्ध उच्चारण की दृष्टि से किसी भी श्रेष्ठ व्यक्ति से मन्त्रारम्भ की प्रक्रिया पूरी की जाए ।

विशेष व्यवस्था

यज्ञोपवीत संस्कार के लिए यज्ञादि की सामान्य व्यवस्था के साथ-साथ नीचे लिखी व्यवस्थाओं पर भी दृष्टि रखनी चाहिए-
१- पुरानी परम्परा के अनुसार यज्ञोपवीत लेने वाले बालकों का मुण्डन करा दिया जाता था, उद्देश्य था शरीर की शृंगारिकता के प्रति उदासीनता । जिन्हें यज्ञोपवीत लेना हो, उनसे एक दिन पूर्व बाल कटवा, छँटवा कर शालीनता के अनुरूप करा लेने का आग्रह किया जा सकता है ।
२- जितनों का यज्ञोपवीत होना है, उसके अनुसार मेखला, कोपीन, दण्ड, यज्ञोपवीत, पीले दुपट्टों की व्यवस्था करा लेनी चाहिए । मेखला और कोपीन संयुक्त रूप से दी जाती है । मेखला कहते हैं कमर में बाँधने योग्य नाड़े जैसे सूत्र को । कपड़े की सिली हुई सूत की डोरी, कलावे के लम्बे टुकड़े से मेखला बना लेनी चाहिए । कोपीन लगभग ४ इञ्च चौड़ी डेढ़ फुट लम्बी लँगोटी होती है । इसे मेखला के साथ टाँक कर भी रखा जा सकता है । दण्ड के लिए लाठी या ब्रह्म दण्ड जैसा रोल भी रखा जा सकता है । यज्ञोपवीत पीले रँगकर रखे जाने चाहिए । न रंग पाएँ, तो उनकी गाँठ को हल्दी से पीला कर देना चाहिए । संस्कार कराने वालों से पहले से ही कहकर रखा जाए कि सभी या कम से कम एक नया वस्त्र धारण करके बैठें । नया दुपट्टा भी लेना पयार्प्त है । संस्कार कराने वाले हर व्यक्ति के लिए पीले दुपट्टे की व्यवस्था करा ही लेनी चाहिए ।
३- गुरु पूजन के लिए लाल मशाल का चित्र रखना चाहिए । गुरु व्यक्ति नहीं चेतना रूप है, ऐसा समझकर युग शक्ति की प्रतीक मशाल को ही गुरु का प्रतीक मानकर रखना अधिक उपयुक्त है ।
४- वेद का अर्थ है- ज्ञान । वेद पूजन के लिए वेद की पुस्तक उपलब्ध न हो, तो कोई पवित्र पुस्तक पीले वस्त्र में लपेट कर पूजा वेदी पर रख देनी चाहिए ।
५- गायत्री, सावित्री एवं सरस्वती पूजन के लिए पूजन वेदी पर चावल की तीन छोटी-छोटी ढेरियाँ रख देनी चाहिए । देव पूजन, रक्षाविधान तक के उपचार पूरे करके विशेष कमर्काण्डों को क्रमबद्ध रूप से कराया जाता है । समय और परिस्थितियों के अनुरूप प्रेरणाएँ एवं व्याख्याएँ भी की जानी चाहिए । क्रिया-निदेर्श और भाव-संयोग का क्रम पूरी सावधानी के साथ बनाया जाए ।

यज्ञोपवीत धारण

शिक्षण और प्रेरणा
कोई भी वस्त्र आभूषण हो, अपनी शोभा प्रतिष्ठा तब बढ़ाता है, जब उसे धारण किया जाए । यज्ञोपवीत प्रतीक का धारण करते हुए यह ध्यान रखा जाए कि यह सूत्र नहीं, इस माध्यम से जीवन में दिव्यता-आदशर्वादिता को धारण किया जा रहा है । इसे सहज ही धारण किया जाना चाहिए; क्योंकि इसके बिना मनुष्य में मनुष्यता का विकास सम्भव नहीं ।

क्रिया और भावना
पाँच यज्ञोपवीतधारी व्यक्ति मिलकर यज्ञोपवीत पहनाते हैं । भाव यह है कि इस दिशा में नया प्रयास, प्रवेश करने वाले को अनुभवियों का सहयोग एवं मागर्दशर्न मिलता रहे । पहनाने वाले जब यज्ञोपवीत पकड़ लें, तो धारण करने वाला उसे छोड़ दे । बायाँ हाथ नीचे कर ले और दाहिना हाथ ऊपर ही उठाये रहे । मन्त्र के साथ्ा यज्ञोपवीत पहना दिया जाए । मन्दिर में प्रतिमा स्थापना जैसा दिव्य भाव बनाये रखें ।



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